लोकसभा चुनाव 2019: हिंदू राष्ट्रवाद का नया ठिकाना बना अरूणाचल प्रदेश

आम चुनावों के समय पूर्वोत्तर के राज्यों में एक ख़ास चलन लंबे समय से देखने को मिला है, इन राज्यों का परिणाम का सीधे तौर पर केंद्र से मिलने वाले अनुदान पर टिका होता है, लेकिन इस बार यहां राष्ट्रवादी भावनाओं का ज्वार सबसे ऊपर नज़र आ रहा है.

यही वजह है कि पश्चिमी सियांग ज़िले में बीते सप्ताह अपनी चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी ने कहा, "जब भारत ने आतंकवादियों को उनके घर में घुस के मारा तो विपक्षी दलों का रवैया कैसा था, ये आप सबने देखा है."

मोदी ने अरुणाचल प्रदेश को देश के लिए ढाल बताते हुए कहा था कि यहां के लोग पूरे जोश से देश की सीमा की रक्षा करते हैं, ऐसे में पूरे राज्य को चौकीदार को वोट देना चाहिए, जो पूरे देश की सुरक्षा के लिए प्रतबिद्ध है.

अरुणाचल में इस बात की परंपरा रही है कि जिसकी केंद्र में सरकार होती है, राज्य में उसको ही बहुमत मिलता है. 2014 में राज्य की विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 60 में से 42 सीटें हासिल हुई थीं, तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी.

राजीव गांधी विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर नानी बाथ ने बीबीसी को बताया, "हम लोग केंद्र की ओर संसाधनों के लिए देखते ज़रूर हैं लेकिन इस रूझान की बड़ी वजह मनोवैज्ञानिक नज़रिया है, यहां के लोग केंद्र सरकार का हिस्सा बनाना चाहते हैं और हमलोग इसके अभ्यस्त हो गए हैं, विचारधारा के स्तर पर आपको यहां की प्रतिबद्धता नहीं दिखेगी."

हालांकि अरुणाचल प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रवादी रूझान कोई नई बात नहीं है. 1962 के बाद से और ख़ासकर जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तबसे इस राज्य में राष्ट्रवाद के भाव को मज़बूत करने की कोशिश की जाती रही.

केंद्र सरकार की इन्हीं कोशिशों के दौरान राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अपनी जड़ें मज़बूत करने का मौक़ा मिल गया. इसके लिए राष्ट्रीय भाषा के तौर पर हिंदी का प्रचार प्रसार और शिक्षा का क्षेत्र सबसे मुफ़ीद साबित हुआ.

नानी बाथ बताते हैं, "अरुणाचल प्रदेश में हर आदमी किसी ना किसी रूप में संघ परिवार से जुड़ा मिलेगा या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा हुआ होगा या फिर विश्व हिंदु परिषद से, नहीं तो विवेकानंद केंद्र विद्यालय से संबंधित होगा."

नानी नाथ ने ख़ुद विवेकानंद केंद्र विद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की है. वे बताते हैं, "वे समाजिक, चिकित्सा और शिक्षा की सेवा में हैं तो व्यावहारिक तौर पर आपका कहीं ना कहीं जुड़ाव हो ही जाएगा."

इसका असर आपको पूरे राज्य में दिखेग क्योंकि अरुणाचली लोगों ने 26 प्रमुख जनजातीय समुदाय और सैकड़ों उप समुदायों को आपस में जोड़ने के लिए हिंदी को संपर्क भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया है.

इटानगर के डेरा नातुग सरकारी कॉलेज में हिंदी के अस्सिटेंट प्रोफ़ेसर जोराम अन्या ताना बताती हैं कि उन्होंने हिंदी को उसकी ख़ूबसूरती के चलते अपनाया. ताना ने एक ईसाई से शादी की है लेकिन वह एबीवीपी और आरएसएस की स्थानीय शाखा की सक्रिय सदस्या हैं.

ताना के मुताबिक़ अरुणाचल प्रदेश में एबीवीपी एक ग़ैर-राजनीतिक संगठन के तौर पर काम करता है और उसकी भागीदारी सामाजिक कामों में ज्यादा है.

ताना नरेंद्र मोदी को अपना आदर्श मानती हैं, वह बताती हैं, "मोदी जी एक दिन में 18-18 घंटे तक काम करते हैं, मुझे अचरज होता है कि वो कितने ताक़तवर हैं लेकिन वो हर बार में मुझे चौंका देते हैं."

इसी कॉलेज में पहले सेमेस्टर के छात्र ताना रोजा बताते हैं कि एबीवीपी के ज़रिए ही उन्हें उन लोगों से मिलने का मौक़ा मिला है, जिन्हें उन्होंने अपना रोल मॉडल बनाया है.

वो बताते हैं, "मैं जब नौवी कक्षा में था तब मुझे एबीवीपी के बारे में ज्यादा मालूम नहीं था, लेकिन यहां व्यक्तित्व विकास का काफ़ी ध्यान रखा जाता है और मुझे अरुणाचल प्रदेश के पहले भारतीय पायलट मोहोन्तो पानजिंग, माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले तापिर म्रा और कार्टूनिस्ट जेनी हाय से मिलने का मौक़ा मिला."

ताना ये भी बताते हैं कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री गेगांग अपांग किस तरह से राज्य में एबीवीपी के पहले बैच में शामिल थे और उन्होंने राज्य के पहले इंटर स्टेर लिविंग कार्यक्रम (सात राज्यों में एक महीने तक चलने वाले शैक्षणिक और सांस्कृतिक टूर) में भी हिस्सा लिया था.

अपांग ने 16 साल पहले राज्य में पहली बार बीजेपी की सरकार बनाई थी. लेकिन हाल ही में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को छोड़ दिया है. पार्टी छोड़ने की वजहों में लीडरशिप का लोकतांत्रिक ढंग से फैसले नहीं कर पाने का आरोप भी शामिल है.

बहरहाल राज्य में एबीवीपी का कार्यालय महज़ नौ साल पहले इटानगर में बनाया गया है, लेकिन यह सगंठन राज्य के गठन के साल यानी 1961 से ही यहां सक्रिय रहा है. इटानगर में एबीवीपी के ज़िला संयोजक शुभम श्रीवास्तव का दावा है कि उनकी ईकाई में 10 हज़ार से ज्यादा छात्र और शिक्षक सदस्य हैं.

हालांकि अरुणाचल प्रदेश में छात्रों का ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टुडेंट्स यूनियन (एएपीएसयू) ज़्यादा प्रभावी है और यह स्थानीय छात्रों को एनएसयूआई, एबीवीपी और एसएफ़आई में शामिल होने से रोकता है.

एएपीसयू, एबवीपी की राज्य में बढ़ती लोकप्रियता को लेकर सजग तो है लेकिन बहुत ज्यादा चिंतित नहीं. एएपीएसयू से संबंधित एक छात्र इसकी वजह बताते हैं, "जब कांग्रेस सत्ता में होती है तो ज्यादा छात्र एनएसयूआई में शामिल हो जाते हैं, जब से बीजेपी की केंद्र में सरकार है तब वे एबीवीपी में शामिल हो रहे हैं. यह सब फंड हासिल करने के लिए है."

स्थानीय लोगों के आस्था को लेकर चलने वाला आंदोलन, आरएसएस के साथ तालमेल कर राज्य में ईसाई धर्मांतरण पर अकुंश लगाने के लिए काम कर रहा है. हालांकि 2011 की जनगणना के मुताबिक़ राज्य में ईसाईयों की आबादी (30.26%), हिंदुओं की आबादी (29.04%) से ज्यादा हो चुकी है.

इनडिजिनियस फेथ एंड कल्चरल सोसायटी ऑफ़ अरुणाचल प्रदेश के वाइस प्रेसीडेंट ताजोम तासुंग बताते हैं, "हिंदुओं और हमारी आस्था में शायद ही कोई अंतर हो, हम भी प्रकृति की पूजा करते हैं."

स्थानीय आस्था को मानने वाले लोगों का समुदाय डोनयी पोलो कहलाता है, जिसमें दूसरी जनजाति के लोग भी समय समय पर शामिल होते रहते हैं, जब किसी दूसरे समुदाय का सदस्य डोनयी पोलो बनता है तो उसे उनकी घर वापसी कहते हैं.

बहरहाल, राज्य में आरएसएस के ज़मीनी काम और ज़िलों में एबीवीपी संगठन की मौजूदगी के चलते राज्य की स्थानीय आबादी में हिंदू राष्ट्रवाद का उभार दिख रहा है.

नानी बाथ कहते हैं, "राज्य में मोदी बेहद लोकप्रिय हैं. लोग रिजिजू को भले वोट देना नहीं चाहें लेकिन मोदी की वापसी ज़रूर चाहते हैं."

अरुणाचल वेस्ट से किरण रिजिजू के ख़िलाफ़ जनता दल (सेक्यूलर) के टिकट पर जार्जुम ऐटे चुनाव लड़ रही हैं. ऐटे राज्य में चुनाव लड़ रहीं इकलौती महिला उम्मीदावर हैं.

ऐटे ने बीते 15 मार्च को कांग्रेस का साथ छोड़ा है क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें तीसरी बार टिकट देने से मना कर दिया था.

उनका मानना है कि राज्य के युवाओं की सोच बदल रही है, इसे ज़ाहिर करने के लिए उन्हें प्लेटफॉर्म चाहिए. वह बताती हैं, "उनको भी दिया जलाने के लिए एक माहौल चाहिए, तूफ़ान में दिया जलाके कोई फ़ायदा नहीं है."

हालांकि अरुणाचल वेस्ट से कांग्रेस ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी को अपना उम्मीदवार बनाया है. इस सीट से उनका उम्मीदवार बनना चौंकाने वाला है क्योंकि वे कभी इस सीट से नहीं जीते हैं.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नबाम तुकी राज्य से लोकसभा में जाने के बदले मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. नानी के मुताबिक़, "बीजेपी ने तुकी की सागाली विधानसभा सीट पर कोई दमदार उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है. कहीं न कहीं रिजिजू और तुकी में आपसी बातचीत हुई होगी."

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